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Thursday, January 31, 2013

Fwd: [HamareSaiBaba] श्री साई सच्चरित्र अध्याय 13



---------- Forwarded message ----------
From: Maneesh Bagga <maneeshbagga@saimail.com>
Date: 2013/1/31
Subject: [HamareSaiBaba] श्री साई सच्चरित्र अध्याय 13
To: hamare sai <hamaresaibaba@googlegroups.com>





अध्याय 13 

अन्य कई लीलाएँ-रोगनिवारण

1.भीमाजी पाटील
2.बाला गणपत दर्जी
3.बापूसाहेब बूटी
4.आलंदीस्वामी
5. काका महाजनी
6.हरदा के दत्तोपंत ।
-----------------------------------

माया की अभेद्य शक्ति
बाबा के शब्द सदैव संक्षिप्त, अर्थपूर्ण, गूढ़ और विद्वतापूर्ण तथा समतोल रहते थे । वे सदा निश्चिंत और निर्भय रहते थे । उनका कथन था कि "मैं फकीर हूँ, न तो मेरे स्त्री ही है और न घर-द्घार ही । सब चिंताओं को त्याग कर, मैं एक ही स्थान पर रहता हूँ । फिर भी माया मुझे कष्ट पहुँचाया करती हैं । मैं स्वयं को तो भूल चुका हूँ, परन्तु माया मुझे नहीं भूलती, क्योंकि वह मुझे अपने चक्र में फँसा लेती है । श्रीहरि की यह माया ब्रहादि को भी नहीं छोड़ती, फिर मुझ सरीखे फकीर का तो कहना ही क्या हैं ? परन्तु जो हरि की शरण लेंगे, वे उनकी कृपा से मायाजाल से मुक्त हो जायेंगे ।" इस प्रकार बाबा ने माया की शक्ति का परिचय दिया । भगवान श्रीकृष्ण भागवत में उदृव से कहते कि "सन्त मेरे जीवित स्वरुप हैं" और बाबा का भी कहना यही था कि वे भाग्यशाली, जिनके समस्त पाप नष्ट हो गये हो, वे ही मेरी उपासना की ओर अग्रसर होते है, यदि तुम केवल 'साई साई' का ही स्मरण करोगे तो मैं तुम्हें भवसागर से पार उतार दूँगा । इन शब्दों पर विश्वास करो, तुम्हें अवश्य लाभ होगा । मेरी पूजा के निमित्त कोई सामग्री या अष्टांग योग की भी आवश्यकता नहीं है । मैं तो भक्ति में ही निवास करता हूँ । अब आगे देखिये कि अनाश्रितों के आश्रयदाता साई ने भक्तों के कल्याणार्थ क्या-क्या किया ।

भीमाजी पाटील : सत्य साई व्रत
नारायण गाँव (तालुका जुन्नर, जिला पूना) के एक महानुभाव भीमाजी पाटील को सन् 1909 में वक्षस्थल में एक भयंकर रोग हुआ, जो आगे चलकर क्षय रोग में परिणत हो गया । उन्होंने अनेक प्रकार की चिकित्सा की, परन्तु लाभ कुछ न हुआ । अन्त में हताश होकर उन्होंने भगवान से प्रार्थना की, "हे नारायण ! हे प्रभो ! मुझ अनाथ की कुछ सहायता करो !" यह तो विदित ही है कि जब हम सुखी रहते है तो भगवत्-स्मरण नहीं करते, परन्तु ज्यों ही दुर्भाग्य घेर लेता है और दुर्दिन आते है, तभी हमें भगवान की याद आती है । इसीलिए भीमाजी ने भी ईश्वर को पुकारा । उन्हें विचार आया कि क्यों न साईबाबा के परम भक्त श्री. नानासाहेब चाँदोरकर से इस विषय में परामर्श लिया जाय और इसी हेतु उन्होंने अपना स्थिति पूर्ण विवरण सहित उनके पास लिख भेजी और उचित मार्गदर्शन के लिये प्रार्थना की । प्रत्युत्तर में श्री. नानासाहेब ने लिख दिया कि "अब तो केवल एक ही उपाय शेष है और वह है साई बाबा के चरणकमलों की शरणागति ।" नानासाहेब के वचनों पर विश्वास कर उन्होंने शिरडी-प्रस्थान की तैयारी की । उन्हें शिरडी में लाया गया और मस्जिद में ले जाकर लिटाया गया । श्री. नानासाहेब और शामा भी इस समय वहीं उपस्थित थे । बाबा बोले कि ,"यह पूर्व जन्म के बुरे कर्मों का ही फल है । इस कारण मै इस झंझट में नहीं पड़ना चाहता ।" यह सुनकर रोगी अत्यन्त निराश होकर करुणपूर्ण स्वर में बोला कि, "मैं बिल्कुल निस्सहाय हूँ और अन्तिम आशा लेकर आपके श्री-चरणों में आया हूँ । आपसे दया की भीख माँगता हूँ । हे दीनों के शरण ! मुझ पर दया करो ।" इस प्रार्थना से बाबा का हृदय द्रवित हो आया और वे बोले कि "अच्छा, ठहरो ! चिन्ता न करो । तुम्हारे दुःखों का अन्त शीघ्र होगा । कोई कितना भी दुःखित और पीड़ित क्यों न हो, जैसे ही वह मस्जिद की सीढ़ियों पर पैर रखता है, वह सुखी हो जाता हैं । मस्जिद का फकीर बहुत दयालु है और वह तुम्हारा रोग भी निर्मूल कर देगा । वह तो सब पर प्रेम और दया रखकर रक्षा करता हैं ।" रोगी को हर पाँचवे मिनट पर खून की उल्टियाँ हुआ करती थी, परन्तु बाबा के समक्ष उसे कोई उल्टी न हुई । जिस समय से बाबा ने अपने श्री-मुख से आशा और दयापूर्ण शब्दों में उक्त उदगार प्रगट किये, उसी समय से रोग ने भी पल्टा खाया । बाबा ने रोगी को भीमाबाई के घर में ठहरने को कहा । यह स्थान इस प्रकार के रोगी को सुविधाजनक और स्वास्थ्यप्रद तो न था, फिर भी बाबा की आज्ञा कौन टाल सकता था ? वहाँ पर रहते हुए बाबा ने दो स्वप्न देकर उसका रोग हरण कर लिया । पहले स्वप्न में रोगी ने देखा कि वह एक विद्यार्थी है और शिक्षक के सामने कविता मुखाग्र न कर सकने के दण्डस्वरुप बेतों की मार से असहनीय कष्ट भोग रहा है । दूसरे स्वप्न में उसने देखा कि कोई हृदय पर नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे की ओर पत्थर घुमा रहा है, जिससे उसे असह्य पीड़ा हो रही हैं । स्वप्न में इस प्रकार कष्ट पाकर वह स्वस्थ हो गया और घर लौट आया । फिर वह कभी-कभी शिऱडी आता और साईबाबा की दया का स्मरण कर साष्टांग प्रणाम करता था । बाबा अपने भक्तों से किसी वस्तु की आशा न रखते थे । वे तो केवल स्मरण, दृढ़ निष्ठा और भक्ति के भूखे थे । महाराष्ट्र के लोग प्रतिपक्ष या प्रतिमास सदैव सत्यनारायण का व्रत किया करते है । परन्तु अपने गाँव पहुँचने पर भीमाजी पाटीन ने सत्यनारायण व्रत के स्थान पर एक नया ही 'सत्य साई व्रत' प्रारम्भ कर दिया ।

बाला गणपत दर्जी
एक दूसरे-भक्त, जिनका नाम बाला गणपत दर्जी था, एक समय जीर्ण ज्वर से पीड़ित हुए । उन्होंने सब प्रकार की दवाइयाँ और काढ़े लिये, परन्तु इनसे कोई लाभ न हुआ । जब ज्वर तिलमात्र भी न घटा तो वे शिरडी दौडे़ आये और बाबा के श्रीचरणों की शरण ली । बाबा ने उन्हें विचित्र आदेश दिया कि, "लक्ष्मी मंदिर के पास जाकर एक काले कुत्ते को थोड़ासा दही और चावल खिलाओ ।" वे यह समझ न सके कि इस आदेश का पालन कैसे करें ? घर पहुँचकर चावल और दही लेकर वे लक्ष्मी मंदिर पहुँचे, जहाँ उन्हें एक काला कुत्ता पूँछ हिलाते हुए दिखा । उन्होंने वह चावल और दही उस कुत्ते के सामने रख दिया, जिसे वह तुरन्त ही खा गया । इस चरित्र की विशेषता का वर्णन कैसे करुँ कि उपयुर्क्त उपाय करने मात्र से ही बाला दर्जी का ज्वर हमेशा के लिये जाता रहा ।

बापूसाहेब बूटी
श्रीमान् बापूसाहेब बूटी एक बार अम्लपित्त के रोग से पीड़ित हुए । उनकी आलमारी में अनेक औषधियाँ थी, परन्तु कोई भी गुणकारी न हो रही थी । बापूसाहेब अम्लपित्त के कारण अति दुर्बल हो गये और उनकी स्थिति इतनी गम्भीर हो गई कि वे अब मस्जिद में जाकर बाबा के दर्शन करने में भी असमर्थ थे । बाबा ने उन्हें बुलाकर अपने सम्मुख बिठाया और बोले, "सावधान, अब तुम्हें दस्त न लगेंगे ।" अपनी उँगली उठाकर फिर कहने लगे "उलटियाँ भी अवश्य रुक जायेंगी ।" बाबा ने ऐसी कृपा की कि रोग समूल नष्ट हो गया और बूटीसाहेब पूर्ण स्वस्थ हो गये ।
एक अन्य अवसर पर भी वे हैजा से पीडि़त हो गये । फलस्वरुप उनकी प्यास अधिक तीव्र हो गई । डाँ. पिल्ले ने हर तरह के उपचार किये, परन्तु स्थिति न सुधरी । अन्त में वे फिर बाबा के पास पहुँचे और उनसे तृशारोग निवारण की औषधि के लिये प्रार्थना की । उनकी प्रार्थना सुनकर बाबा ने उन्हें "मीठे दूध में उबाला हुआ बादाम, अखरोट और पिस्ते का काढ़ा पियो ।" - यह औषधि बतला दी ।
दूसरा डाँक्टर या हकीम बाबा की बतलाई हुई इस औषधि को प्राणघातक ही समझता, परन्तु बाबा की आज्ञा का पालन करने से यह रोगनाशक सिद्ध हुई और आश्चर्य की बात है कि रोग समूल नष्ट हो गया ।

आलंदी के स्वामी
आलंदी के एक स्वामी बाबा के दर्शनार्थ शिरडी पधारे । उनके कान में असह्य पीड़ा थी, जिसके कारण उन्हें एक पल भी विश्राम करना दुष्कर था । उनकी शल्य चिकित्सा भी हो चुकी थी, फिर भी स्थिति में कोई विशेष परिवर्तन न हुआ था । दर्द भी अधिक था । वे किंकर्तव्यविमूढ़ होकर वापिस लौटने के लिये बाबा से अनुमति माँगने गये । यह देखकर शामा ने बाबा से प्रार्थना की कि, "स्वामी के कान में अधिक पीड़ा है । आप इन पर कृपा करो ।" बाबा आश्वासन देकर बोले, "अल्लाह अच्छा करेगा ।" स्वामीजी वापस पूना लौट गये और एक सप्ताह के बाद उन्होंने शिरडी को पत्र भेजा कि "पीड़ा शान्त हो गई है । परन्तु सूजन अभी पूर्ववत् ही है ।" सूजन दूर हो जाय, इसके लिए वे शल्यचिकित्सा (आपरेशन) कराने बम्बई गये । शल्यचिकित्सा विशेषक्ष (सर्जन) ने जाँच करने के बाद कहा कि शल्यचिकित्सा (आपरेशन) की कोई आवश्यकता नहीं । बाबा के शब्दों का गूढ़ार्थ हम निरे मूर्ख क्या समझें?

काका महाजनी
काका महाजनी नाम के एक अन्य भक्त को अतिसार की बीमारी हो गई । बाबा का सेवा-क्रम कहीं टूट न जाय, इस कारण वे एक लोटा पानी भरकर मस्जिद के एक कोने में रख देते थे, ताकि शंका होने पर शीघ्र ही बाहर जा सकें । श्री साईबाबा को तो सब विदित ही था । फिर भी काका ने बाबा को सूचना इसलिये नहीं दी कि वे रोग से शीघ्र ही मुक्ति पा जायेंगे । मस्जिद में फर्श बनाने की स्वीकृति बाबा से प्राप्त हो ही चुकी थी, परन्तु जब कार्य प्रारम्भ हुआ तो बाबा क्रोधित हो गये और उत्तेजित होकर चिल्लाने लगे, जिससे भगदड़ मच गई । जैसे ही काका भागने लगे, वैसे ही बाबा ने उन्हें पकड़ लिया और अपने सामने बैठा लिया । इस गडबड़ी में कोई आदमी मूँगफली की एक छोटी थैली वहाँ भूल गया । बाबा ने एक मुट्ठी मूँगफली उसमें से निकाली और छील कर दाने काका को खाने के लिये दे दिये । क्रोधित होना, मूँगफली छीलना और उन्हें काका को खिलाना, यह सब कार्य एक साथ ही चलने लगा । स्वंय बाबा ने भी उसमें से कुछ मूँगफली खाई । जब थैली खाली हो गई तो बाबा ने कहा कि मुझे प्यास लगी है । जाकर थोड़ा जल ले आओ । काका एक घड़ा पाना भर लाये और दोनों ने उसमें से पानी पिया । फिर बाबा बोले कि, "अब तुम्हारा अतिसार रोग दूर हो गया । तुम अपने फर्श के कार्य की देखभाल कर सकते हो ।" थोडे ही समय में भागे हुए लोग भी लौट आये । कार्य पुनः प्रारम्भ हो गया । काका कारो अब प्रायः दूर हो चुका था । इस कारण वे कार्य में संलग्न हो गये । क्या मूँगफली अतिसार रोग की औषधि है ? इसका उत्तर कौन दे ? वर्तमान चिकित्सा प्रणाली के अनुसार तो मूँगफली से अतिसार में वृद्घि ही होती है, न कि मुक्ति । इस विषय में सदैव की भाँति बाबा के श्री वचन ही औषधिस्वरुप थे ।

हरदा के दत्तोपन्त
हरदा के एक सज्जन, जिनका नाम श्री दत्तोपन्त था, 14 वर्ष से उदररोग से पीड़ित थे । किसी भी औषधि से उन्हें लाभ न हुआ । अचानक कहीं से बाबा की कीर्ति उनके कानों में पड़ी कि उनकी दृष्टि मात्र से ही रोगी स्वस्थ हो जाते हैं । अतः वे भी भाग कर शिरडी आये और बाबा के चरणों की शरण ली । बाबा ने प्रेम-दृष्टि से उनकी ओर देखकर आशीर्वाद देकर अपना वरद हस्त उनके मस्तक पर रखा । आशीष और उदी प्राप्त कर वे स्वस्थ हो गये तथा भविष्य में फिर कोई पीड़ा न हुई ।
इसी तरह के निम्नलिखित तीन चमत्कार इस अध्याय के अन्त में टिप्पणी में दिये गये हैं –
माधवराव देशपांडे बवासीर रोग से पीडि़त थे । बाबा की आज्ञानुसार सोनामुखी का काढ़ा सेवन करने से वे नीरोग हो गये । दो वर्ष पश्चात् उन्हें पुनः वही पीड़ा उत्पन्न हुई । बाबा से बिना परामर्श लिये वे उसी काढ़े का सेवन करने लगे । परिणाम यह हुआ कि रोग अधिक बढ़ गया । परन्तु बाद में बाबा की कृपा से शीघ्र ही ठीक हो गया ।
काका महाजनी के बड़े भाई गंगाधरपन्त को कुछ वर्षों से सदैव उदर में पीड़ा बनी रहती थी । बाबा की कीर्ति सुनकर वे भी शिरडी आये और आरोग्य-प्राप्ति के लिये प्रार्थना करने लगे । बाबा ने उनके उदर को स्पर्श कर कहा, "अल्लाह अच्छा करेगा ।" इसके पश्चात् तुरन्त ही उनकी उदर-पीड़ा मिट गई और वे पूर्णतः स्वस्थ हो गये ।
श्री नानासाहेब चाँदोरकर को भी एक बार उदर में बहुत पीड़ा होने लगी । वे दिनरात मछली के समान तड़पने लगे । डाँ. ने अनेक उपचार किये, परन्तु कोई परिणाम न निकला । अन्त में वे बाबा की शरण में आये । बाबा ने उन्हें घी के साथ बर्फी खाने की आज्ञा दी । इस औषधि के सेवन से वे पूर्ण स्वस्थ हो गये ।
इन सब कथाओं से यही प्रतीत होता है कि सच्ची औषधि, जिससे अनेंकों को स्वास्थ्य-लाभ हुआ, वह बाबा के केवल श्रीमुख से उच्चरित वचनों एवं उनकी कृपा का ही प्रभाव था ।

।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।


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Tuesday, January 29, 2013

Fwd: [mysaibaba20] Akhand Naam Jaap (Mississauga, Canada)



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From: Pardeep Kaushal <pardeepji@ymail.com>
Date: Tue, Jan 29, 2013 at 8:02 AM
Subject: [mysaibaba20] Akhand Naam Jaap (Mississauga, Canada)
To:


SAIBABA AKHAND (Nonstop) NAAMJAAP IN MISSISSAUGA (CANADA).
Come And Feel The Power Of NaamSumiran
 
Shri Sachidananda Sadguru Sainath Maharaj Ki Jai!!
Om Sai Ram,
              You are cordially invited for our 3rd annual Akhand (Non Stop) Shri Sai Baba Naam Sumiran on family day long weekend on Saturday 16Th, February 2013 from 1:30 p.m. till 8:30 p.m. at Sai Niwas in Mississauga (Ontario) Canada. Please call 416-895-7905 or email pardeepji@ymail.com for directions and participation. Naam jaap can be in any chosen form of God as our Baba always said," Sab Ka Malik Ek." There will be various NaamJaap during this time.No language or religion barrier.
                Let us celebrate Family Day Long Weekend with the Head of Family and feel the vibrations of continuous Naam Jaap.
Just bring pure devotion and bless us and get blessed yourself.
Please feel free to forward this message to your family, friends & other spiritually inclined devotees.
Parshaad (Preeti Bhoj) will be provided to all devotees at closing, tea and snacks will be served around 5.30 p.m.
 
                 Baba Kakad Aarti, Abhishek, Pujan will also be performed (Program will start at 7.30 A.M.). At 1.25 P.M. approx. Sai Swagtam will be recited to welcome Baba into sabha mandap and also so that every devotee takes his/her place in time. Please note there will be no chatting or socializing during naam jaap at any part of the house, feel free to do so after the naam jaap.
                 P.S.:- There will be strictly Naam Jaap only during this time to keep Naam Sumiran Akhand (Non stop), Dhoop Aarti will be offered at closing. Please No Bhajans, experience sharing, stories, parayan or anything else during Naam Jaap. If willing Bhajans can be sung after Dhoop Aarti .
            Please reply a.s.a.p. if you will be attending, so that we can make proper  arrangement. Baba will be waiting for you.
 
 
If You Look At Me , I Look At You.
 
 





Friday, January 11, 2013

Fwd: [HamareSaiBaba] श्री साई सच्चरित्र अध्याय (10)



---------- Forwarded message ----------
From: Maneesh Bagga <maneeshbagga@saimail.com>
Date: 2013/1/10
Subject: [HamareSaiBaba] श्री साई सच्चरित्र अध्याय (10)
To: hamare sai <hamaresaibaba@googlegroups.com>





अध्याय 10 - 
श्री साईबाबा का रहन-सहन, शयन पटिया, शिरडी में निवास, उनके उपदेश, उनकी विनयशीनता, नानावली, सुगम पथ ।
_____________________________________

प्रारम्भ
श्री साईबाबा का सदा ही प्रेमपूर्वक स्मरण करो, क्योंकि वे सदैव दूसरों के कल्याणार्थ तत्पर तथा आत्मलीन रहते थे । उनका स्मरण करना ही जीवन और मृत्यु की पहेली हल करना है । साधनाओं में यह अति श्रेष्ठ तथा सरल साधना है, क्योंकि इसमें कोई द्रव्य व्यय नहीं होता । केवल मामूली परिश्रम से ही भविष्य नितान्त फलदायक होता है । जब तक इन्द्रियाँ बलिष्ठ है, क्षण-क्षण इस साधना को आचरण में लाना चाहिये । अन्य सब देवी-देवता तो भ्रमित करने वाले है, केवल गुरु ही ईश्वर है । हमें उनके ही पवित्र चरणकमलों में श्रद्धा रखनी चाहिये । वे तो हर इन्सान के भाग्यविधाता और प्रेममय प्रभु हैं । जो अनन्य भाव से उनकी सेवा करेंगे, वे भवसागर से निश्चय ही मुक्ति को प्राप्त होंगे । न्याय अथवा मीमांसा या दर्शनशास्त्र पढ़ने की भी कोई आवश्यकता नहीं है । जिस प्रकार नदी या समुद्र पार करते समय नाविक पर विश्वास रखते है, उसी प्रकार का विश्वास हमें भवसागर से पार होने के लिये सदगुरु पर करना चाहिये । सदगुरु तो केवल भक्तों के भक्ति-भाव की ओर ही देखकर उन्हें ज्ञान और परमानन्द की प्राप्ति करा देते हैं ।
गत अध्याय में बाबा की भिक्षावृत्ति, भक्तों के अनुभव तथा अन्य विषयों का वर्णन किया गया हैं । अब पाठकगण सुनें कि श्री साईबाबा किस प्रकार रहते, शयन करते और शिक्षा प्रदान करते थे ।

बाबा का विचित्र बिस्तर
पहले हम यह देखेंगे कि बाबा किस प्रकार शयन करते थे । श्री नानासाहेब डेंगले एक चार हाथ लम्बा और एक हथेली चौड़ा लकड़ी का तख्ता श्री साईबाबा के शयन के हेतु लाये । तख्ता कहीं नीचे रखकर उस पर सोते, ऐसा न कर बाबा ने पुरानी चिन्दियों से मस्जिद की बल्ली से उसे झूले के समान बाँधकर उस पर शयन करना प्रारम्भ कर दिया ।
चिन्दियों के बिल्कुल पतली और कमजोर होने के कारण लोगों को उसका झूला बनाना एक पहेली-सा बन गया । चिन्दियाँ तो केवल तख्ते का भी भार सहन नहीं कर सकती थी । फिर वे बाबा के शरीर का भार किस प्रकार सहन कर सकेंगी? जिस प्रकार भी हो, यह तो राम ही जानें, परन्तु यह तो बाबा की एक लीला थी, जो फटी चिन्दियाँ तख्ते तथा बाबा का भार सँभाल रही थी । बाबा को तख्ते पर बैठे या शयन करते हुए देखना, देवताओं को भी दुर्लभ दृश्य था । सब आश्चर्यचकित थे कि बाबा किस प्रकार तख्ते पर चढ़ते होंगे और किस प्रकार नीचे उतरते होंगे । कौतूहलवश लोग इस रहस्योद्घघाटन के हेतु दृष्टि लगाये रहते थे, परंतु यह समझने में कोई भी सफल न हो सका और इस रहस्य को जानने के लिये भीड़ उत्तरोत्तर बढ़ने लगी । इस कारण बाबा ने एक दिन तख्ता तोड़कर बाहर फेंक दिया । यद्यपि बाबा को अष्ट सिद्घियाँ प्राप्त थीं, परन्तु उन्होंने कभी भी उनका प्रयोग नहीं किया और न कभी उनकी ऐसी इच्छा ही हुई । वे तो स्वतः ही स्वाभाविक रुप से पू्र्णता प्राप्त होने के कारण उनके पास आ गई थी ।

ब्रह्म का सगुण अवतार
ब्राहृदृष्टि से श्री साईबाबा साढ़े तीन हाथ लम्बे एक सामान्य पुरुष थे, फिर भी प्रत्येक के हृदय में वे विराजमान थे । अंदर से वे आसक्ति-रहित और स्थिर थे, परन्तु बाहर से जन-कल्याण के लिये सदैव चिन्तित रहते थे । अंदर से वे संपूर्ण रुप से निःस्वार्थी थे । भक्तों के निमित्त उनके हृदय में परम शांति विराजमान थी, परंतु बाहर से वे अशान्त प्रतीत होते थे । वे भीतर से ब्रह्मज्ञानी, परन्तु बाहर से संसार में उलझे हुए दिखलाई पड़ते थे । वे कभी प्रेमदृष्टि से देखते तो कभी पत्थर मारते, कभी गालियाँ देते और कभी हृदय से लगाते थे । वे गम्भीर, शान्त और सहनशील थे । वे सदैव दृढ़ और आत्मलीन रहते थे और अपने भक्तों का सदैव उचित ध्यान रखते थे। वे सदा एक आसन पर ही विराजमान रहते थे । वे कभी यात्रा को नहीं निकले । उनका दंड एक छोटी सी लकड़ी था, जिसे वे सदैव अपने पास सँभाल कर रखते थे । विचारशून्य होने के कारण वे शान्त थे । उन्होंने कंचन और कीर्ति की कभी चिन्ता नहीं की तथा सदा ही भिक्षावृति द्घारा निर्वाह करते रहे । उनका जीवन ही इस प्रकार का था । "अल्लाह मालिक" सदैव उनके होठों पर रहता था । उनका भक्तों पर विशेष और अटूट प्रेम था । वे आत्म-ज्ञान की खान और परम दिव्य स्वरुप थे । श्री साईबाबा का दिव्य स्वरुप इस तरह का था । एक अपरिमित, अनन्त, सत्य और अपरिवर्तनशील सिद्घान्त, जिसके अन्तर्गत यह सारा विश्व है, श्री साईबाबा में आविर्भूत हुआ था । यह अमुल्य निधि केवल सत्वगुण-सम्पन्न और भाग्यशाली भक्तों को ही प्राप्त हुई । जिन्होंने श्री साईबाबा को केवल मनुष्य या सामान्य पुरुष समझा या समझते है, वे यथार्थ में अभागे थे या हैं ।
श्री साईबाबा के माता-पिता तथा उनकी जन्मतिथि का ठीक-ठीक पता किसी को भी नहीं है तो भी उनके शिरडी में निवास के द्घारा इसका अनुमान लगाया जा सकता हैं । जब पहलेपहल बाबा शिरडी में आये थे तो उस समय उनकी आयु केवल 16 वर्ष की थी । वे शिरडी में 3 वर्ष तक रहने के बाद फिर कुछ समय के लिये अन्तर्धान हो गये । कुछ काल के उपरान्त वे औरंगाबाद के समीप (निजाम स्टेट) में प्रकट हुए और चाँद पाटील की बारात के साथ पुनः शिरडी पधारे । उस समय उनकी आयु 20 वर्ष की थी । उन्होंने लगातार 60 वर्षों तक शिरडी में वास किया और सन् 1918 में महासमाधि ग्रहण की । इन तथ्यों के आधार पर हम कह सकते है कि उनकी जन्म-तिथि सन् 1838 के लगभग थी ।

बाबा का ध्येय और उपदेश
सत्रहवी शताब्दी (1608-1681) में सन्त रामदास प्रकट हुए और उन्होंने यवनों से गायों और ब्राह्मणों की रक्षा करने का कार्य सफलतापूर्वक किया । परन्तु दो शताब्दियों के व्यतीत हो जाने के बाद हिन्दू और मुसलमानों में वैमनस्य बढ़ गया और इसे दूर करने के लिये ही श्री साईबाबा प्रगट हुए । उनका सभी के लिये यही उपदेश था कि "राम (जो हिन्दुओं का भगवान है) और रहीम (जो मुसलमानों का खुदा है) एक ही है और उनमें किंचित मात्र भी भेद नहीं है । फिर तुम उनके अनुयायी क्यों पृथक-पृथक रहकर परस्पर झगड़ते हो ? अज्ञानी बालको ! दोनों जातियाँ एकता साध कर और एक साथ मिलजुलकर रहो । शांत चित्त से रहो और इस प्रकार राष्ट्रीय एकता का ध्येय प्राप्त करो । कलह और विवाद व्यर्थ है । इसलिए न झगड़ो और न परस्पर प्राणघातक ही बनो । सदैव अपने हित तथा कल्याण का विचार करो । श्री हरि तुम्हारी रक्षा अवश्य करेंगे । योग, वैराग्य, तप, ज्ञान आदि ईश्वर के समीप पहुँचने के मार्ग है । यदि तुम किसी तरह सफल साधक नहीं बन सकते तो तुम्हारा जन्म व्यर्थ है । तुम्हारी कोई कितनी ही निन्दा क्यों न करे, तुम उसका प्रतिकार न करो । यदि कोई शुभ कर्म करने की इच्छा है तो सदैव दूसरों की भलाई करो ।"
संक्षेप में यही श्री साईबाबा का उपदेश है कि उपयुक्त कथनानुसार आचरण करने से भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में तुम्हारी प्रगति होगी ।

सच्चिदानंद सदगुरु श्री साईनाथ महाराज
गुरु तो अनेक है कुछ गुरु ऐसे है, जो द्घार-द्घार हाथ में वीणा और करताल लिये अपनी धार्मिकता का प्रदर्शन करते फिरते हैं । वे शिष्यों के कानों में मंत्र फूँकते और उनकी सम्पत्ति का शोषण करते हैं । वे ईश्वर भक्ति तथा धार्मिकता का केवल ढोंग ही रचते हैं । वे वस्तुतः अपवित्र और अधार्मिक होते है । श्री साईबाबा ने धार्मिक निष्ठा प्रदर्शित करने का विचार भी कभी मन में नहीं किया । दैहिक बुद्घि उन्हें किंचितमात्र भी छू न गई थी । परन्तु उनमें भक्तों के लिए असीम प्रेम था । गुरु दो प्रकार के होते है –
नियत और अनियत ।
अनियत गुरु के आदेशों से अपने में उत्तम गुणों का विकास होता तथा चित्त की शुद्घि होकर विवेक की वृद्घि होती है । वे भक्ति-पथ पर लगा देते हैं । परन्तु नियत गुरु की संगति मात्र से द्घैत बुद्घि का ह्रास शीघ्र हो जाता है । गुरु और भी अनेक प्रकार के होते है, जो भिन्न-भिन्न प्रकार की सांसारिक शिक्षाये प्रदान करते हैं । यथार्थ में जो हमें आत्मस्थित बनाकर इस भवसागर से पार उतार दे, वही सदगुरु है । श्री साईबाबा इसी कोटि के सदगुरु थे । उनकी महानता अवर्णीनीय है । जो भक्त बाबा के दर्शनार्थ आते, उनके प्रश्न करने के पूर्व ही बाबा उनके समस्त जीवन की त्रिकालिक घटनाओं का पूरा-पूरा विवरण कह देते थे । वे समस्त भूतों में ईश्वर-दर्शन किया करते थे । मित्र और शत्रु उन्हें दोनों एक समान थे । वे निःस्वार्थी तथा दृढ़ थे । भाग्य और दुर्भाग्य का उन पर कोई प्रभाव न था । वे कभी संशयग्रस्त नहीं हुए । देहधारी होकर भी उन्हें देह की किंचितमात्र आसक्ति न थी । देह तो उनके लिए केवल एक आवरण मात्र था । यथार्थ में तो वे नित्य मुक्त थे ।
वे शिरडीवासी धन्य है, जिन्होंने श्री साईबाबा की ईश्वर-रुप में उपासना की । सोते-जागते, खाते-पीते, वाड़े या खेत तथा घर में अन्य कार्य करते हुए भी वे लोग सदैव उनका स्मरण तथा गुणगान करते थे । साईबाबा के अतिरिक्त दूसरा कोई ईश्वर वे मानते ही न थे । शिरडी की नारियों के प्रेम की माधुरी का तो कहना ही क्या है ! वे विलकुल भोलीभाली थी । उनका पवित्र प्रेम उन्हें ग्रामीण भाषा में भजन रचने की सदैव प्रेरणा देता रहता था । यद्यपि वे शिक्षित न थी तो भी उनके सरल भजनों में वास्तविक काव्य की झलक थी । यह कोई विदृता न थी, वरना उनका सच्चा प्रेम ही इस प्रकार की कविता का प्रेरक था । कविता तो सच्चे प्रेम का प्रगट स्वरुप ही है, जिसमें चतुर श्रोता-गण ही यथार्थ दर्शन या रसिकता का अनुभव करते है । 

बाबा की विनयशीलता
ऐसा कहते है कि भगवान् में 6 प्रकार के विशेष गुण होते है – 
यथा
कीर्ति
श्री
वैराग्य
ज्ञान
ऐश्वर्य और
उदारता
श्री साईबाबा में भी ये सब गुण विद्यमान थे । उन्होंने भक्तों की इच्छा-पूर्ति के निमित्त ही सगुण अवतार धारण किया था । उनकी कृपा (दया) बड़ी ही विचित्र थी। भक्तों के हेतु वे अपने श्रीमुख से ऐसे वचन कहते, जिनका वर्णन करने का सरस्वती भी साहस न कर सकती । उनमें से यहाँ पर एक रोचक नमूना दिया जाता हैं । बाबा अति विनम्रता से इस प्रकार बोलते "दासानुदास, मैं तुम्हारा ऋणी हूँ," कैसी विनम्रता है ? 
यद्यपि बाहृय दृष्टि से बाबा विषय-पदार्थों का उपभोग करते हुए प्रतीत होते थे, परन्तु उन्हें किंचितमात्र भी उनकी गन्ध न थी और न ही उनके उपभोग का ज्ञान था । वे खाते अवश्य थे, परन्तु उनकी जिव्हा को कोई स्वाद न था । वे नेत्रों से देखते थे, परन्तु उस दृश्य में उनकी कोई रुचि न थी । काम के सम्बन्ध में वे हनुमान सदृश अखंड ब्रहमचारी थे । उन्हें किसी पदार्थ में आसक्ति न थी । वे शुद्घ चैतन्य स्वरुप थे, जहाँ समस्त इच्छाएँ, अहंकार और अन्य चेष्टाएँ विश्राम पाती थी । संक्षेप में वे निःस्वार्थ, मुक्त और पूर्ण ब्रहम थे । इस कथन को समझने के हेतु एक रोचक कथा का उदाहरण यहाँ दिया जाता है ।

नानावली
शिरडी में नानावली नाम का एक विचित्र और अनोखा व्यक्ति था । वह बाबा के सब कार्यों की देखभाल किया करता था । एक समय जब बाबा गादी पर विराजमान थे, वह उनके पास पहुँचा । वह स्वयं ही गादी पर बैठना चाहता था । इसलिये उसने बाबा को वहाँ से हटने को कहा । बाबा ने तुरन्त गादी छोड़ दी और तब नानावल्ली वहाँ विराजमान हो गया । थोड़े ही समय वहाँ बैठकर वह उठा और बाबा को अपना स्थान ग्रहण करने को कहा । बाबा पुनः आसन पर बैठ गये । यह देखकर नानावली उनके चरणों पर गिर पड़ा । इस प्रकार अनायास ही आज्ञा दिये जाने और वहाँ से उठाये जाने के कारण बाबा में किंचितमात्र भी अप्रसन्नता की झलक न थी ।

सुगम पथः 
संतों की कथाओं का श्रवण करना और उनका समागम 
यद्यपि बाहय दृष्टि से श्री साईबाबा का आचरण सामान्य पुरुषों के सदृश ही था, परन्तु उनके कार्यों से उनकी असाधारण बुद्घिमत्ता और चतुराई स्पष्ट ही प्रतीत होती थी । उनके समस्त कर्म भक्तों की भलाई के निमित्त ही होते थे । उन्होने कभी भी अपने भक्तों को किसी आसन या प्राणायाम के नियमों अथवा किसी उपासना का आदेश कभी नहीं दिया और न उनके कानों में कोई मन्त्र ही फूँका । उनका तो सभी के लिये यही कहना था कि चातुर्य त्याग कर सदैव साई साई यही स्मरण करो । इस प्रकार आचरण करने से समस्त बन्धन छूट जायेंगे और तुम्हें मुक्ति प्राप्त हो जायेगी । पंचाग्नि, तप, त्याग, स्मरण, अष्टांग योग आदि का साध्य होना केवल ब्राहमणों को ही सम्भव है ।
मन का कार्य विचार करना है । बिना विचार किये वह एक क्षण भी नहीं रह सकता । यदि तुम उसे किसी विषय में लगा दोगे तो वह उसी का चिन्तन करने लगेगा और यदि उसे गुरु को अर्पण कर दोगे तो वह गुरु के सम्बन्ध में ही चिन्तन करता रहेगा । आप लोग बहुत ध्यानपूर्वक साई की महानता और श्रेष्ठता श्रवण कर ही चुके है । ये कथाएँ सासारिक भय को निर्मूल कर आध्यात्मिक पथ पर आरुढ़ करती है । इसलिये इन कथाओं का हमेशा श्रवण और मनन करो तथा आचरण में भी लाओ । यदि इन्हें कार्यान्वित किया गया तो न केवन ब्राहमण, वरन स्त्रियाँ और अन्य दलित जातियाँ भी शुदृ और पावन हो जायेंगी । सासारिक कार्यों में लगे रहने पर भी अपना चित्त साई और उनकी कथाओं में लगाये रहो । तब तो यह निश्चत है कि वे कृपा अवश्य करेंगे । यह मार्ग अति सरल होने पर भी क्या कारण है कि सब कोई इसका अवलम्बन नहीं करते ? कारण केवल यह है कि ईश-कृपा के अभाववश लोगों मे सन्त कथाएँ श्रवण करने की रुचि उत्पन्न नहीं होती । ईश्वर की कृपा से ही प्रत्येक कार्य सुचारु एवम सुंदर ढंग से चलता है । सन्तों की कथा का श्रवण ही सन्तसमागम सदृश है । सन्त-सानिध्य का महत्व अति महान है । उससे दैहिक वुद्घि, अहंकार और जन्म मृत्यु के चक्र से मुक्ति, हो जाती है । हृदय की समस्त ग्रंथियाँ खुल जाती है और ईश्वर से मिलन हो जाता है, जो चैतन्यघन स्वरुप है । विषयों से निश्चय ही विरक्ति बढ़ती है तथा दुःखों और सुखों में स्थिर रहने की शक्ति प्राप्त हो जाती है और आध्यात्मिक उन्नति सुलभ हो जाती है । यदि तुम कोई साधन जैसे नामस्मरण, पूजन या भक्ति इत्यादि नहीं करते, परन्तु अनन्य भाव से केवल सन्तों के ही शरणागत हो जाओ तो वे तुम्हें आसानी से भवसागर के उस पार उतार देंगे । इसी कार्य के निमित्त ही सन्त विश्व में प्रगट होते है । पवित्र नदियाँ – गंगा, यमुना, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि जो संसार के समस्त पापों को धो देती है, वे भी सदैव इच्छा करती है कि कोई महात्मा अपने चरण-स्पर्श से हमें पावन करे । ऐसा सन्तों का प्रभाव है । गत जन्मों के शुभ कर्मों के फलस्वरुप ही श्री साई चरणों की प्राप्ति संभव है ।
मैं श्रीसाई के मोह-विनाशक चरणों का ध्यान कर यह अध्याय समाप्त करता हूँ । उनका स्वरुप कितना सुन्दर और मनोहर है । मस्जिद के किनारे पर खड़े हुए वे सब भक्तों को, उनके कल्याणार्थ उदी वितरण किया करते है । जो इस विश्व को मिथ्या मानकर सदा आत्मानंद में निमग्न रहते थे, ऐसे सच्चिदानंद श्रीसाईमहाराज के चरणकमलों में मेरा बार-बार नमस्कार हैं ।
।। श्री सद्रगुरु साईनाथार्पणमस्तु । शुभं भवतु ।।

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Monday, December 17, 2012

Guru Mantra


 
Guru Brahma Mantra
To gain spiritual upliftment
September 1999 issue
|| Om Bram Brahmaatvam Siddhim Gum Gurave Namah ||
gurubrahmatva.wav
 
Muladhar Chakra Mantra
For Activation of Muladhar Chakra
March 2000 issue
|| Om Lam Par Tatvaay Vam Sham Sham Sam Om Phat   ||
muladhar.wav
 
Swaddhistthan Chakra Mantra
For activation of Swaddhistthan Chakra
April 2000 issue
|| Om Vam Vam Swaadhishtthaanam Jaagray Jaagray Vam Vam Om Phat ||
swathisthaan.wav
 
Manipur Chakra Mantra
For activation of Manipur Chakra
May 2000 issue
|| Om Ram Chakra Jaagrannay Mannipuraay Ram Om Phat ||
manipur.wav
 
Anahat Chakra Jagran Mantra
For activation of Anahat Chakra
February 2000 (Hindi) issue
|| Om Yam Anaahatam Jaagray Jaagray Sfottay Om Sham ||
anaahat.wav
 
Vishuddh Chakra Mantra
For Activation of Vishuddh Chakra
August 2000 issue
|| Om Ham Vishuddh Jaagray Jaagray Tatva Beejaay Om Phat    ||
 
Aagya Chakra Mantra
For Activation of Aagya Chakra
 issue
||     ||
 
Sahastrahaar Chakra Mantra
For Activation of Sahastrahaar Chakra
May 2000 issue
|| Om Hreem Sahastraaaram Jaagray Jaagray Sfotay Udbheday Ayeim Om Phat  ||
sahastraar.wav
 
Lord Siddheshwar Shiv Mantra
For fulfilment of wishes
January 2000 issue
|| Om Shreem Manovaanchhitam Dehi Om Om Namah Shivay ||
siddheshwar.wav
 
Lord Gorishwar Shiv Mantra
For fortune, Beauty and Wealth
January 2000 issue
|| Hreem Om Namah Shivaay Hreenm  ||
gorishwar.wav
 
Lord Paardeshwar Shiv Mantra
To worship Paarad (Solidified Mercury) Shivaling. To fulfil one's wishes
June 2000 issue
|| Om Sham Shambhavaay Paardeshwaraay Sashaktikaay Namah ||
paardeshwar.wav
 
Mahamritunjay Mantra
To overcome diseases, mishaps and fear of untimely death.
June 2000 issue
|| Om Hroum Joom Sah Bhoorbhuvah Swaaha.  ||
|| Om Trayambakam Yajaamahe Sugandhinim Pushtivardhanam. ||
|| Urvaarukmiv Bandhanaanmrityormuksheeya Mahaamritaat Swah. ||
|| Swah Bhuvah Bhooh Om. ||
|| Sah Joom Hroum Om. ||
mahamritunjaya.wav
 
Lord Paashupataastrey Mantra
For Success in Sadhanas and good luck
  June 2000 issue
|| Om Har, Maheshwar, Shoolpaanni, Pinaak Dhrik, Pashupati, Shiv Mahaadev Eeshaan Namah Shivaay. ||
paashupateyastra.wav
 
Lord Rudra Mantra
For a healthy body and happy mind
June 2000 issue
|| Om Sarva Aroghaay Rudraaye Hroum Kreem Phat.||
rudra.wav
 
Lord Raameshwaram Shiv Mantra
To obtain wealth and success in task 
June 2000 issue
|| Om Hloum Shivaay Shivparaay Phat. ||
rameshwaramshiv.wav
 
Kaamnaa Siddhi Mantra
For fulfilment of one's wishes through the divine grace of Lord Shiva
June 2000 issue
|| Om Saamb Sadaashivaay Namah. ||
kamnasiddhi.wav
 
Lord Kuber Mantra
To gain wealth, fortune, comforts and prosperity
June 2000 issue
|| Om Shreem Om Hreem Shreem Hreem Kleem Shreem Kleem Vitteswaraay Namah.  ||
kuber.wav
 
Goddess Kanakdhara Mantra
For wealth and prosperity
Various issues
|| Om Vam Shreem Vam Ayeim Hreem Kleem Kanakdhaaraayei Namah ||
kanakdhara.wav
 
ShreeYantra Mantra
To gain Wealth
September 1999 issue
|| Om Shreem Hreem Shreem Mahaalakshmyei Shreem Hreem Shreem Namah ||
shreeyantra.wav
 
Vyapaar Lakshmi Mantra
For success in business
April 1994 issue
|| Om Shreem Hreem Shreem Kamale Kamalaalaye Praseed Praseed Shreem Hreem Shreem Om Maha Laxmayei Namah ||
kamalamahalakshmi.wav 
 
MahaLakshmi Mantra
For Wealth and Prosperity
 
||   ||
mahalakshmi.wav
 
Ganpati Prayer Mantra
Ganpati Prayer
Various issues
 
Chintamani Ganpati Mantra
To remove all problems in life
Various issues
|| Om Shreem Hreem Shreem Chintamani Ganpatyei Vaanchitaarth Pooray Pooray Lakshmidaayak Kridhim Vridhim Kuru Kuru SarvSokhayam Soubhagayam Kuru Kuru Shreem Hreem Shreem Om   ||
chintamaniganpati.wav
 
Lakshmi Vinaayak Mantra
For all round Progress in life
November 1999 issue
|| Om Shreem Gam Soumyaay Gannpataye Var Varade Sarvajanam Me Vasmaanay Swaahaa   ||
lakshmivinayak.wav
 
Ganpati Mantra
For Sound Physique
April 1994 issue
|| Gan Ganpataye Namah ||
ganpati.wav
 
Kaamya Ganpati Mantra
For fulfilment of wishes
June 2000 issue
|| Om Gam Goum Gannapataye Vignanaashine Swaahaa. ||
kaamyaganpati.wav
 
Uchhisht Ganpati Mantra
For riddance from effect of evil rituals/black magic
June 2000 issue
  || Om Gam Hum Tantra Baadhaa Nivaarannaay Shreem Ganneshaay Swaahaa.  ||
uchchishtganpati.wav
 
Sumukh Ganpati Mantra
To obtain physical beauty and magnetism in personality
April 2000 issue
|| Om Sham Shemam Roopam Soubhagya Deeptaye Deeptaye Phat. ||
sumukhganpati.wav
 
 
Aapad Uddharak Batuk Bheirav Mantra
For Solutions to problems of life
  April 2000 issue
|| Om Hreem Batukaay Aapad Uddhaaraay Kuru Kuru Batukaay Hreem Om Swaahaa.  ||
batukbheirav.wav
 
Unmatt Bheirav Mantra
For the ill and the childless
April 2000 issue
|| Om Un Unmattaay Bhram Bhram Bheiravaay Namah. ||
unmattbheirav.wav
 
Kaal Bheirav Mantra
For Allaying fear of foes, accidents and death
April 2000 issue
|| Om Bheiravaay Vam Vam Vam Hraam Shrom Namah. ||
kaalbheirav.wav
 
Planet Sun Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Hraam Hreem Hroum Sah Suryaay Namah. ||
sun.wav
 
Planet Jupiter Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Graam Greem Groum Sah Guruve Namah. ||
jupiter.wav
 
Planet Rahu Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Praam Preem Proum Sah Rahave Namah.  ||
rahu.wav
 
Planet Ketu Mantra
To obtain all round success
Various issues
||  Om Shraam Shreem Shroum Sah Ketave Namah.  ||
ketu.wav
 
Planet Jupiter Mantra
To obtain all round success
Various issues
jupiter.wav
 
Planet Mars Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Kraam Kreem Kroum Sah Bhomaye Namah.   ||
mars.wav
 
Planet Moon Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Shraam Shreem Shroum Sah Chandramase Namah.   ||
  moon.wav
 
Planet Saturn Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Praam Preem Proum Sah Saneiye Namah.  ||
saturn.wav
 
Planet Venus Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Praam Preem Proum Sah Shukraaye Namah.  ||
venus.wav
 
Planet Mercury Mantra
To obtain all round success
Various issues
|| Om Braam Breem Broum Sah Budhaaye Namah.   ||
mercury.wav
 
Apsara Rambha Mantra
For manifestation of Apsara and fulfilment of wishes
May 2000 issue
  || Om Hreem Ram Rambhe! Aagachh Aagyaam Paalay Manovaanchhitam Dehi Ayeim Om Swaahaa. ||
rambhaapsara.wav
 
Apsara Anangmekhla Mantra
For manifestation of Apsara and fulfilment of wishes
September 1999 issue
|| Om Hreem Ayeim Anangmekhalaayei Ayeim Hreem Om Phat ||
anangmekhlaapsara.wav
 
Apsara Pushpdeha Mantra
For manifestation of Apsara and fulfilment of wishes
April 1994 issue
  || Hreem Gleem Bloum Pushp Deha Sukh Saubhagaya Dehi Dehi Mam Vashyam Bloum Phat ||
pushpdehaapsara.wav
 
Shodash Yogini Mantra
To obtain success in every field
July 2000 issue
|| Om Ayeim Hreem Kleem Shreem Vram Shroum Dhrim Sham Drim Kreem Hleem Nrim Prom Yam Sham Gum Shodash Yoginyei Namah. ||
shodashyogini.wav
 
Hypnotism Keshav Mantra
To Hypnotise by grace of Lord Krishna
July 2000 issue
|| Kleem Keshvaay Namah ||
hypnotismkeshav.wav
 
Govind Mantra
For fulfilment of wishes
July 2000 issue
|| Om Shreem Kleem Krishnnaay Govindaay Hreem Om Swaahaa. ||
govindwish.wav
 
Madhusoodan Mantra
For riddance from enemies
July 2000 issue
|| Om Shree Krishnnaay Asuraakraant Bhaarhaarinne Namah. ||
madhusoodan.wav
 
Mahabaahu Mantra
To obtain physical strength
July 2000 issue
|| Om Nrim Narsinghaay Bal Pradaay Mahaabaahave Hreem Om Phat. ||
mahabaahu.wav
 
Goddess MahaKali Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Kreem Kreem Kreem Hreem Hreem Houm Houm Dakshin Kalike Kreem Kreem Kreem Hreem  Hreem Houm Houm Sawaahaa.  ||
mahakali.wav
 
Goddess Tara Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Om Hreem Treem Houm Phat  ||
tara.wav
 
Goddess Shodashi Tripur Sundari Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Om Hreem Ka A Ee La Hreem Hasakahalahreem Sakalahreem  ||
tripursundari.wav
 
Goddess Bhuvaneshwari Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Om Hreem Om  ||
bhuvaneshwari.wav
 
Goddess Chhinmasta Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Shreem Hreem Kleem Ayeim Vajra Veirochaniye Houm Houm Phat Sawaahaa   ||
chhinmasta.wav
 
Goddess Tripur Bheiravi Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Haseih Hasakari Haseih  ||
tripurbheiravi.wav
 
Goddess Matangi Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Om Hreem Ayeim Shreem Namo Bhagwati Uchchishtchaandaalini Shree Matangeshwari Sarvajanvanshkari Sawaahaa  ||
matangi.wav
 
Goddess Kamala Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Ayeim Hreem Shreem Kleem Souh Jagatprasutayei Namah  ||
kamala.wav
   
Goddess Dhoomavati Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Dhoom Dhoom Dhoomavati Thah Thah  ||
dhoomavati.wav
 
Goddess Baglamukhi Mahavidya Mantra
Mantra of one of the most powerful Tantra deity (Mahavidya)
Various issues
|| Om Hleem Baglamukhi Sarvdushtaanam Vaacham Mukham Padam Stambhaye Jhivya Keelay Budhim Vinaashay Hleem Om Phat  ||
baglamukhi.wav
 
Navarann Mantra
For all round success
Various issues
|| Aing Hring Kling Chaamundayei Vichche  ||
navaarann.wav
 
Lord Hanuman Protection Mantra
For protection from all diseases, dangers and misfortunes in future
October 1999 issue
|| Om Namo Bhagwate Aanjaneyaay Mahaabalaay Hanumate Namah. ||
hanuman1.wav
 
Lord Hanuman Success Matra
For Success in Tasks
Various issues
|| Om Hanumate Namah ||
hanuman2.wav
 
Lord Hanuman Manifestation Matra
Ritual for Manifestation
March 2000 issue
|| Om Namo Hanumantaay Aaveshay Aaveshay Swaahaa ||
  hanumanmanifest.wav
 
Lord Hanuman Confidence Matra
To Boost your Selfconfidence
March 2000 issue
|| Om Hum Om Hum Om Hanumate Phat ||
hanumanconfidence.wav
 
Kartikeya Mantra
To Remove all misfortune
November 1999 issue
|| Om Kam Ksham Kam Kaartikeyaay Phat   ||
kartikeya.wav
 
Mantra to Remove Obstacles
Various Issues
|| Om Kleem Kaleshnaashay Kleem Phat ||
badhaanivaaran.wav
 
Mantra for Honourable Social Status
April 1994 issue
|| Om Hreem Ayeim Vighna Nashaaya Phat  ||
status.wav
 
Mantra for Realisation of God
April 1994 issue
|| Om Brahmatmane Ishta Darshaya Darshaya Hoom || 
soul.wav
 
Mantra to Conquer Enemy
April 1994 issue
|| Om Kreem Kreem Kreem Hleem Hleem 'Amuk' Shatru Maraya Maraya Hleem Kreem Kreem Kreem Phat  ||
conquerenemy.wav